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कालसर्प योग

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नमस्कार प्रिय पाठको 🙏 आज हम राहु केतु से बनने वाले कालसर्प योगों के बारे में जानेंगे। ज्योतिष शास्त्र अनुसार राहु और केतु के मध्य सारे ग्रह हो तो कालसर्प योग बनता है वहीं कुछ ज्योतिषाचार्य का मानना है के राहु और केतु के साथ या बाहर एक या दो ग्रह हो तो आंशिक कालसर्प योग बनता है जोकि कालसर्प योग के तुलना में आंशिक कालसर्प योग कम कष्ट कारक होता है। राहु और केतु दोनों ही छाया ग्रह है। ज्योतिष अनुसार इनके प्रभाव काफी कम होते हैं। राहु के जन्म के नक्षत्र के देवता यम यानी काल है और केतु के जन्म नक्षत्र अश्लेषा के देवता सर्प है। राहु के गुण और अवगुण शनि की तरह ही होते हैं। यही कारण है कि राहु शनि ग्रह के जैसे ही प्रभाव डालता है। किसी भी तरह का काल सर्प योग जो राहु से आरंभ हो रहा हो वह बहुत अधिक कष्टकारी होता है, किंतु केतु से लेकर राहु तक बनने वाला कालसर्प योग ज्यादा कष्टकारी नहीं होता यह सदैव ध्यान रखें। ग्रहों के गोचर के समय एक ऐसी स्थिति भी बनती है जब सभी ग्रह राहु और केतु के बीच होते हैं। मेष राशि से लेकर मीन राशि तक राहु सभी राशियों में लगभग 18 वर्षों में अपना गोचर पूर्ण कर ल...

ग्रहों का तत्व Grahon ka Tatva

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ग्रहों के तत्व विभाजन :- पृथ्वी तत्व :-  बुध जल तत्व :-   शुक्र  अग्नि तत्व  :-  मंगल आकाश तत्व :- बृहस्पति  वायु तत्व :- शनि इन पांच ग्रहों को पांच तत्वों में विभाजित किया गया है। सूर्य और चंद्रमा ये ग्रह अग्नि और जल के प्रधान अधिपति है-- सूर्य :-   संसार में जितने भी प्रकार की अग्नि चाहे इंधन के द्वारा अग्नि बिजली से प्राप्त अग्नि सभी अभी अग्नि के अधिपति सूर्य हैं मंगल भी अग्नि के कारक है पर इनके पास वैकल्पिक व्यवस्था है जैसे चोट लगे दुर्घटना व आगजनी हो जाए तो मंगल को देखा जाता है। चंद्रमा :- कहते हैं कि संसार में और आपके शरीर में जितने भी जल है सब के अधिपति मात्र चंद्रमा शुक्र नहीं लेकिन जल के कारक शुक्र भी कहे गए हैं संपूर्ण जल के अधिपति नदी की बात होना ले समुंदर बरसात के पानी आंसू सब के अधिपति प्रधान रूप से चंद्रमा है तो यहां पर शुक्र को वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया जैसे जल को बांध बनाकर रोका गया पानी पीने के लिए पानी जलापूर्ति सिंचाई के लिए जो मानव द्वारा परिवर्तित किया जाए उसके गुणों को प्रकृति ऐसी व्यवस्थाओं के लिए शुक्र...

राशि के चिन्ह और पद

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नमस्कार प्रिय पाठकों 🙏 वैदिक ज्योतिष में १२ राशियों को उनके चिन्ह (आकृतियां) दी गई है। इन्हीं आकृति द्वारा राशियों के स्वभाव को भी जाना जाता है। राशि के चिन्ह और पद :- राशि आकृति पद मेष भेड़ की आकृति है चतुष्पद वृषभ बैल की आकृति है चतुष्पद मिथुन स्त्री पुरुष का जोड़ा स्त्री के हाथ में वीणा और पुरुष के हाथ में गदा है (पराशर के अनुसार) द्विपद कर्क केकड़ा की आकृति है बहुपद सिंह शेर की आकृति है तुष्पद कन्या नाव पर बैठी कन्या और उसके एक हाथ में लालटेन है और दूसरे हाथ में अन्न है (धान या गेहूं) है (शास्त्रानुसार) द्विपद तुला पुरुष के हाथ में तराजू (शास्त्रानुसार) द्विपद वृश्चिक बिच्छू की आकृति है बहुपद धनु अगला हिस्सा मनुष्य और पिछला हिस्सा घोड़े का और हाथ में धनुष ताने हुए है  द्विपद चतुष्पद मकर अगला हिस्सा हिरण का पिछला हिस्सा मगरमच्छ का है चतुष्पद कुंभ पुरुष के सिर के ऊपर घड़ा है और घड़ा कहीं न कहीं फटा है और घड़े का सारा जल पुरुष के कपड़े को गिला करता हुआ निकल जाता है  अपद या विपद मीन दो मछलियों का जोड...

राशियों और ग्रहों कि दिशाएं Rashi Aur Grah ki Disha

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नमस्कार प्रिय पाठको 🙏 आज हम राशियों के दिशाओं के बारे में जानेंगे :- ज्योतिष शास्त्र में राशियों को दिशाओं की संज्ञा दी गई है दिशा में राशियों का क्या महत्व है किस राशि से किस दिशा की बात होती है। किन किन राशियों को किन किन दिशाओं की संज्ञा प्राप्त है। किन राशियों का किस दिशाओं में निवास स्थान है। ज्योतिष में भी इसका बहुत महत्व है फलित ज्योतिष में भी यह काम आता है और मुहूर्त ज्योतिष में भी इसका बहुत महत्व है। वास्तु शास्त्र में राशियों कि दिशा अत्याधिक महत्वपूर्ण है। फलित सिद्धांत में दिशाओं के सम्बन्ध में जितने भी प्रश्न है उनके लिए राशि ओर ग्रहों कि दिशाओं का ज्ञान होना अतिआवश्यक है। दिशाओं के स्वामित्व राशियां :-- पूर्व दिशा :-   मेष, सिंह और धनु यह अग्नि तत्व की राशियां है। इन्हें पूर्व दिशा का स्वामित्व प्राप्त है। दक्षिण दिशा :- वृषभ, कन्या और मकर यह पृथ्वी तत्व की राशियां है। इन्हें दक्षिण दिशा का स्वामित्व प्राप्त है। पश्चिम दिशा :- मिथुन, तुला और कुम्भ यह वायु तत्व की राशियां है। इन्हें पश्चिम दिशा का स्वामित्व प्राप्त है। उत्तर दिशा :- कर्क, वृश्चिक और मी...

राशियों और ग्रहों के गुण स्वभाव Rashiyo Aur Graho ke Gun Swabhav

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प्रिय पाठकों नमस्कार 🙏 आज हम राशियों की दिशा और उनके 3 गुण के बारे में जानेंगे ज्योतिष शास्त्र में राशियों को गुण भी बताए गए है। तीन गुण :- १. सतोगुण २. रजोगुण ३. तमोगुण राशियों के गुण :- सतोगुण :-   कर्क, सिंंह, धनु और मीन रजोगुण :-   मेष, वृृश्चिक, वृषभ और तुला तमोगुण :-   मिथुन, कन्या, मकर और कुंभ वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के भी गुण स्वरूप है:- सतोगुण :-  सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति रजोगुण :-  बुध और शुक्र तमोगुण :-  मंगल और शनि ग्रहों के गुण के लिए ग्रह कुंडली के जिस भाव में बैठे है उस भाव सम्बंधित गुणों को देखा जाता है अर्थात यदि कोई ग्रह पिता के भाव में है तो उस ग्रह सम्बंधित गुणों से पिता के गुण स्वरूप की विवेचना यदि कोई ग्रह पत्नी के भाव में है तो उस ग्रह सम्बंधित गुणों से पत्नी के गुण स्वरूप की व्याख्या की जाती है सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के जातक का स्वभाव :- सतोगुण  :- जो सत्य के निकट रहते हैं जो इस भाव में अधिक रहते हैं कि यह सब छोड़ कर जाना है क्या व्यर्थ की भागदौड़ में अधिक मरना सच्चे छल कपट कम शीघ्र झुकते नहीं...

राशि और ग्रहों का वर्णात्मक विभाजन Rashi Aur Grahon Ka Varnatmak Vibhajan

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प्रिय पाठकों नमस्कार 🙏 आज हम राशियों का वर्णनात्मक विभाजन के बारे में जानेंगे--- किसी भी जातक के स्वभाव के बारे में जानने के लिए ज्योतिष शास्त्र में वर्णों का भी विचार किया जाता है इससे जातक का स्वभाव कैसा है यह हमें कुछ हद तक पता चल जाता है। जैसे की हम सभी जानते हैं वर्ण चार होते हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । ज्योतिष शास्त्र में १२ राशियों को इन्हीं चार वर्णों में विभाजित किया है जो इस प्रकार है। राशियों का वार्णात्मक विभाजन :- ब्राह्मण वर्ण कर्क, वृश्चिक और मीन ये सभी सम राशि है यह सौम्य और स्त्री प्रधान राशि मानी गई है। यह जल तत्व की राशियां है क्षत्रिय वर्ण मेष, सिंह और धनु यह सभी विषम राशियां है यह क्रूर और पुरुष प्रधान राशिया है। यह अग्नि तत्व की राशियां है वैश्य वर्ण वृषभ, कन्या और मकर ये सब राशि सम राशि है तथा सौम्य और स्त्री प्रधान राशि है। यह पृथ्वी तत्व की राशियां है। शूद्र वर्ण मिथुन, तुला और कुम्भ यह सभी विषम राशियां है यह क्रूर और पुरुष प्रधान राशिया है। यह वायु तत्व की राशियां है। जिस ज...

राशि और ग्रह (त्रिदोष) Rashi Aur Grah (Tridosh)

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🙏 नमस्कार प्रिय पाठकों त्रिदोष और राशि संबंध:- आज हम त्रिदोष के बारे में जानेंगे अर्थात किस राशि का सम्बन्ध किस दोष से है। मुख्यतः तीन शारीरिक दोष होते है:- १.पित्त २.वात/वायु ३.कफ ये तीन शारीरिक दोष होते है आयुर्वेद के अनुसार शरीर मे वात अर्थात हवा, पित्त अर्थात भोजन को पचाने के रस और कफ अर्थात बलगम का दोष होता है। आयुर्वेदानुसार सिर से लेकर के छाती के बीच तक के रोग कफ के बिगड़ने से होते है। छाती के बीच से लेकर पेट या कमर के अंत तक मे होने वाले रोग पित्त के बिगड़ने के कारण होते है। और कमर से लेकर घुटनें और पैरों के अंत तक होने वाले रोग वात बिगड़ने के कारण होते है। राशियों में दोषों का विभाजन :- ज्योतिष शास्त्र में राशियों द्वारा तीन दोषों का विभाजन किया गया है। ताकि राशियों द्वारा हम जातक में होने वाले दोष की जानकारी पा सके। ज्योतिष शास्त्र में दोषों को राशि तत्वों में विभाजित किया है अर्थात अग्नि तत्व राशि , पृथ्वी तत्व राशि , वायु तत्व राशि , जल तत्व राशि   इन्ही चार तत्वों में दोष को विभाजित किया गया हैै। १. पित्त दोष :- मेष, सिंह और धनु इन राशियों से पित्त दोष का वि...

तत्व निर्धारण बताते हैं राशियों के गुण-दोष Tatav Nirdharan Dwara Rashio Ke Gun/dosh

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प्रिय पाठकों नमस्कार 🙏 तत्व निर्धारण - राशियों के गुण दोष वैदिक ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल रूपी चार तत्वों के अनुसार १२ राशियों को ३-३ राशि के चार समूहों में बांटकर उसका तत्व निर्धारित करते हैं। पहली त्रिकोण राशियों मेष, सिंह, धनु का तत्व अग्नि है। अग्नि में रूप परिवर्तन की क्षमता होती है। अतः अग्नि तत्व प्रधान राशियों में क्रियात्मक शक्ति का समावेश होता है। दूसरी त्रिकोण राशियों वृष, कन्या और मकर का तत्व पृथ्वी है। पृथ्वी में यथार्थता का गुण होता है। अतः पृथ्वी तत्व प्रधान राशियां भौतिकता प्रिय एवं पूर्ण सांसारिक होती हैं। तीसरी त्रिकोण राशियों मिथुन, तुला एवं कुंभ का तत्व वायु है। इसमें चचंलता, अनिश्चय एवं बुद्धिमता का गुण है। अतः वायु-तत्व प्रधान राशियां परिवर्तन प्रिय एवं मानसिक रूप से सबल एवं प्रभावशाली होती हैं। चौथी त्रिकोण राशियों कर्क, वृश्चिक एवं मीन का तत्व जल है।जल तत्व में ग्रहण करने की क्षमता होती है, इसलिए जल तत्व प्रधान राशियों में आत्मविश्लेषण, खोज एवं ग्रहण करने का विशेष गुण होता है। ऐसे जान सकते हैं अपने संबंध :- राशियों के तत्व...

राशि तत्व Rashi Tatva

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🙏 नमस्कार  प्रिय पाठकों   राशि तत्व:- चार राशिचक्र तत्व बुनियादी चरित्र गुणों, भावनाओं, व्यवहार और सोच पर गहरा प्रभाव डालते हैं। चार राशिचक्र तत्व में से प्रत्येक तत्व हमारे भीतर कार्यरत होता है और हर तत्व एक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व हैं। हर ऊर्जा के प्रतिनिधित्व को समझकर सभी सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करके व्यक्ति के सकारात्मक गुणों को समझ पाने में ज्योतिष शास्त्र हमारी मदद करता  है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में १२ राशियों को चार भागों में बांटा गया है। इनमें १.अग्नि तत्व २. पृथ्वी तत्व ३. वायु तत्व ४. जल तत्व अग्नि तत्व राशि :-   १. मेष   २. सिंह   ३. धनु   इस राशि के जातक भावुक, गतिशील और मनमौजी होते हैं और इन्हें जल्दी ही ग़ुस्सा आ जाता है। अग्नि राशि के जातक साहसी, ऊर्जावान और आदर्शवादी होते हैं। अग्नि तत्व वाले जातक दृढ़ इच्छा शक्ति वाले, कर्मशील और गतिशील रहते हैं। अग्नि के समान ज्वाला भी इनमें देखी जा सकती है और हर कार्य में अत्यधिक जल्दबाज भी होते हैं। पृथ्वी तत्व राशि :-   १. वृषभ २. कन्या   ३. मकर  ...

राशि स्वभाव Rashi swabhav

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प्रिय पाठकों मेरा नमस्कार 🙏 आज हम राशियों के स्वभाव बारे में जानेंगे :- शास्त्र में १२ राशियों का एक चक्र है जो क्रमशः इस प्रकार है:- मेष वृषभ मिथुन कर्क सिंह कन्या तुला वृश्चिक धनु मकर कुंभ मीन राशियों को दो भागों में विभाजित किया गया है प्रथम विषम राशि द्वितीय सम राशि। विषम राशि मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ। सम राशि वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन। प्रायः विषम राशि को क्रूर राशि और पुरुष राशि के नाम से भी जाना जाता है और सम राशि को सौम्य राशि और स्त्री राशि के नाम से भी जाना जाता है जिस राशि में जातक का जन्म होता है, तदनुसार, उसका स्वाभाव होता है:- तथापि, सभी क्रूर या पुरूष राशियों में, मेष, सिंह, कुम्भ अधिक क्रूर तथा मिथुन, तुला, धनु कम क्रूर होती है।  सौम्य राशि या स्त्री राशि में वृष, मीन सर्वथा सौम्य तथा कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर मध्यम सौम्य होती हैं। फल कथन में राशिश के निर्बल रहने पर राशिबल ही देखा जाता है। राशि स्वभाव:- राशियों को तीन...

कारक, अकारक एवं मारक Karak, Akarak aur Marak

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कुंडली में कारक, अकारक और मारक ग्रह की परिभाषा:- ग्रहों को नैसर्गिक ग्रह विचार रूप से शुभ और अशुभ श्रेणी में विभाजित किया गया है। बृहस्पति, शुक्र, पक्षबली चंद्रमा और शुभ प्रभावी बुध शुभ ग्रह माने गये हैं और शनि, मंगल, राहु व केतु अशुभ माने गये हैं। सूर्य ग्रहों का राजा है और उसे क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गई है। बुध, चंद्रमा, शुक्र और बृहस्पति क्रमशः उत्तरोत्तर शुभकारी हैं, जबकि सूर्य, मंगल, शनि और राहु अधिकाधिक अशुभ फलदायी हैं। कुंडली के द्वादश भावों में षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव अशुभ (त्रिक) भाव हैं, जिनमें अष्टम भाव सबसे अशुभ है षष्ठ से षष्ठ - एकादश भाव, तथा अष्टम से अष्टम तृतीय भाव, कुछ कम अशुभ माने गये हैं। अष्टम से द्वादश सप्तम भाव और तृतीय से द्वादश - द्वितीय भाव को मारक भाव और भावेशों को मारकेश कहे हैं। केंद्र के स्वामी निष्फल होते हैं परंतु त्रिकोणेश सदैव शुभ होते हैं। नैसर्गिक शुभ ग्रह केंद्र के साथ ही 3, 6 या 11 भाव का स्वामी होकर अशुभ फलदायी होते हैं। ऐसी स्थिति में अशुभ ग्रह सामान्य फल देते हैं। अधिकांश शुभ बलवान ग्रहों की 1, 2, 4, 5, 7, 9 और 10 भाव म...

ग्रहों की अवस्था. Graho Ki Avastha

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ग्रहों की बालादि अवस्था वैदिक ज्योतिष में ग्रहो की कई प्रकार की अवस्थाओं का वर्णन मिलता है. यह अवस्थाएँ ग्रहों के अंश अथवा अन्य कई तरह के बलों पर आधारित होती हैं. इन्हीं अवस्थाओं में से ग्रहों की एक अवस्था बालादि अवस्थाएँ होती हैं. जिनमें ग्रहों को उनके अंशों के आधार पर बल मिलता है. बालादि अवस्था में सम राशि में स्थित ग्रह का बल तथा विषम राशि मे स्थित ग्रह का बल अलग होता है. इन बलों के अनुसार ही जातक अपने जीवन में ग्रहो के फलो को भोगता है. बालादि अवस्था में ग्रहो के बल उनके अंश तथा राशि पर आधारित होते है. राशि का महत्व इसलिए है क्योंकि सम राशि में स्थित ग्रह का फल विषम राशि में स्थित ग्रह से एकदम अलग हो सकता है. विषम राशि सम राशि 1. मेष 2. वृषभ 3. मिथून 4. कर्क 5. सिंह 6. कन्या 7. तुला 8. वृश्चिक 9. धनु 10. मकर 11. कुम्भ 12. मीन जिस प्रकार इस जगत में मनुष्यों की बाल, कुमार, युवा एवं वृद्ध अवस्थाएं होती हैं, ठीक उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की भी बाल, कुमार, युवा एवं वृद्ध अवस्थाएं होती हैं। ग्रहों की ये अवस्थाएं जातक के...

ग्रहों के बीच मित्रता, शत्रुता, सामान्य सम्बन्ध और तत्कालिक मित्रता, शत्रुता Grahon ke bich Mitrata, Shatruta, Samanya sambandh Aur Tatkalik Mitrata, Shatruta

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ग्रहों के बीच नैसर्गिक या स्वाभाविक मित्रता, शत्रुता और सामान्य सम्बन्ध तथा तात्कालिक मित्रता, शत्रुता सभी ग्रहों की अन्य ग्रहों से नैसर्गिक मित्रता होती है जिससे वह एक-दूसरे से मित्र, शत्रु व समता का भाव रखते हैं. ग्रहों की यह मैत्री फलादेश में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि कोई भी ग्रह तभी अच्छा कहा जाएगा जब वह अपनी उच्च, स्वराशि,मूलत्रिकोण राशि अथवा मित्र राशि में स्थित होगा. अच्छा होना पर ही ग्रह अपनी दशा/अन्तर्दशा में शुभ परिणाम दे सकता है। राहु/केतु की अपनी कोई राशि नही होती है इसलिए वह जिस राशि में स्थित होते हैं उस राशि स्वामी के अनुसार फल देते हैं। मित्रग्रह/नैसर्गिक मित्र:- ग्रहों की इस नैसर्गिक मित्रता में दो समूह बनते हैं. एक समूह में सूर्य, चन्द्रमा, मंगल तथा गुरु आते हैं और दूसरे समूह में शनि, शुक्र तथा बुध आते हैं. समूह में मौजूद ग्रह आपस में मित्र कहलाते हैं. सत्याचार्य का मत है कि  –  सभी ग्रह अपनी मूलत्रिकोण राशि से २, ४, ५, ८, ९, १२ राशियों के स्वामियों से और अपनी उच्च राशि के स्वामी से स्वभाविक या नैसर्गिक मित्रता रखते है...

उच्च और नीच के ग्रह Uchch Aur Nich Ke Grah

उच्च और नीच के ग्रह ग्रहों की स्थितियों को लेकर प्रायः लोगों के मन में भ्रम रहता है कि किस राशि में ग्रह उच्च के हैं और किस राशि में ग्रह नीच के तो आज हम ग्रह के उच्च राशि और नीच राशि के बारे में जानेंगे के कितने अंश तक किस राशि में ग्रह उच्च के होते हैं और कितने अंश तक किस राशि में ग्रह नीच के होते हैं सबसे पहले आप यह जान लीजिए कि ग्रह जिस राशि में उच्च के होते हैं ठीक उससे सातवीं राशि में नीच के होते हैं । बुध एक मात्र ऐसा ग्रह है जो अपनी ही राशि (कन्या) में उच्च का होता है और गुरु की राशि (मीन) में नीच का होता है ग्रह उच्च राशि अंश नीच राशि अंश सूर्य मेष 10° तुला 10° चंद्रमा बृषभ 3° वृश्चिक 3° मंगल मकर 28° कर्क 28° बुध कन्या 15° मीन 15° बृहस्पति कर्क 5° मकर 5° शुक्र मीन 27° कन्या 27° शनि तुला 20° मेष 20° राहु मिथुन 15° धनु 15° केतु धनु 15° मिथुन 15° ग्रहों के अंश, राशि उपरोक्त चार्ट में देखें 👆 उदाहरण के लिए :- सूर्य मेष राशि में उच्च का होता है पर 10 अंश तक ही उच्च का फल देगा उसके बा...

Nakshatra, Nakshatra Svabhav Aur Unke Swami

ज्योतिष के २७ नक्षत्र और उनके ९ स्वामी ज्योतिष शास्त्र में विभिन्न प्रकार के नक्षत्रों का जिक्र किया गया है। ये सभी नक्षत्र जितने महत्वपूर्ण हैं उतने ही वैयक्तिक जीवन पर भी असर डालते हैं। आपको यकीन नहीं होगा लेकिन ये सच है कि जिस नक्षत्र में इंसान जन्म लेता है वह नक्षत्र उसके स्वभाव और आगामी जीवन पर अपना असर जरूर छोड़ता है। आइए जानें भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में जन्म लेने वाले लोगों की क्या-क्या खासियत होती है। नक्षत्र स्वभाव नक्षत्र स्वामी ज्योतिष शास्त्र में सबसे प्रमुख और सबसे प्रथम अश्विन नक्षत्र को माना गया है। जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेता है वह बहुत ऊर्जावान होने के सथ-साथ हमेशा सक्रिय रहना पसंद करता है। इनकी महत्वाकांक्षाएं इन्हें संतुष्ट नहीं होने देतीं। ये लोग रहस्यमयी प्रकृत्ति के इंसान होने के साथ-साथ थोड़े जल्दबाज भी होते हैं जो पहले काम कर लेते हैं और बाद में उस पर विचार करते हैं। ये लोग अच्छे जीवनसाथी और एक आदर्श मित्र साबित होते हैं। अशिवनी केतु इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र ग्रह होता है, जिसकी वजह से इस नक्षत्र में जन्में लोग आराम पसंद और आलीशान जीवन...